उत्तराखंड का खैंट पर्वत: जहाँ रहती हैं परियां.  क्या वाकई में ?

उत्तराखंड का खैंट पर्वत: जहाँ रहती हैं परियां. क्या वाकई में ?

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क्या आपका कभी मन नहीं हुआ कि; किसी परी से मिला जाये. क्या फिल्मों की तरह, हकीकत में ऐसे स्थान मौजूद हैं ? जहाँ परियां रहती हैं.

अगर आप भी किसी परी से मिलना चाहते हैं; तो इसके लिए आपको उत्तराखंड जरुर आना चाहिए. क्यूंकि यहाँ प्रचलित कई किवंदतियों के अनुसार; उत्तराखंड में एक स्थान ऐसा है, जहाँ आज भी परियो का निवास है. और यह स्थान है – खैंट पर्वत.

खैंट पर्वत की location इतनी खूबसूरत है कि; यह न केवल इंसानों को अपनी ओर आकर्षित करती है, बल्कि, देवी-देवता भी इस ओर खिंचे चले आते हैं.

10 हजार फीट की ऊंचाई पर घास का मैदान, और सामने टिहरी झील का नजारा, दक्षिण में माँ चन्द्रबदनी का मंदिर, तो दूर दक्षिण-पश्चिम में माँ सुरकंडा का मंदिर और चारों ओर हिमालय की श्रेणियां. ये सब मन को इतना मोह लेते है कि; यहाँ से जाने का मन ही नहीं होता.

अमेरिका की मैसच्यूसेट्स यूनिवर्सिटी का एक दल जब यहाँ पहुंचा; तो उनके उपकरणों ने भी, यहाँ पर किसी अदृश्य शक्ति के होने का प्रमाण प्रस्तुत किया.

आइये; इस आर्टिकल में विस्तार से जानेंगे, खैंट पर्वत के बारे में. आखिर क्यों इसे परियों का देश कहा जाता है? कौन हैं वो 9 बहनें, जो यहाँ रहती हैं? और क्या है इसके पीछे की कहानी ? आइये जानते हैं –

खैंट पर्वत की Location

उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल जिले में खैंट पर्वत स्थित है.

"खैंट पर्वत की location"

यह टिहरी गढ़वाल के फेगुलि पट्टी में स्थित है. 10 हजार फीट की उंचाई पर स्थित खैंट पर्वत के दक्षिण में टिहरी झील है. इसका आकार गुम्बद नुमा है.

खैंट पर्वत के आसपास पर्वतों की 9 श्रेणियां मौजूद हैं. ऐसा माना जाता है कि; इन 9 श्रेणियों में ही 9 आन्छरियाँ रहती हैं, जो कि आपस में बहने हैं.

इस स्थान पर धान को कूटने वाली ओखलियाँ, जमीन पर ना होकर, चट्टानों की दीवारों पर मौजूद हैं. जो कि अपने आप में रहस्यमयी है.

टिहरी झील के समीप पीपलडाली पुल से होते हुए इस स्थान की ओर जाया जाता है.

कैसे पहुंचे खैंट पर्वत तक

अगर आप खैंट पर्वत की सैर करने आना चाहते हैं. तो आपको सड़क मार्ग से आना होगा.

उत्तराखंड से बाहर; से आने वालों को, ऋषिकेश से चंबा (टिहरी गढ़वाल) वाला सड़क मार्ग बहुत ही सुगम पड़ेगा. यह ऋषिकेश-गंगोत्री राजमार्ग (NH – 94) के नाम से जाना जाता है.

"खैंट पर्वत तक पहुँचने का मार्ग"

चंबा में ही बॉलीवुड फिल्म “बत्ती गुल मीटर चालू” फिल्म की शूटिंग हुई थी.

चंबा से टिहरी झील के किनारे किनारे होते हुए लगभग 47 किमी के बाद पीपलडाली पुल आता है.

पीपलडाली पुल होते हुए रजाखेत से दाहिनी हाथ की ओर मुड़कर लगभग 18 किमी दूर थात गांव आता है.

थात गांव सड़क मार्ग का अंतिम पड़ाव है. यहाँ से लगभग 6 किमी की खड़ी चड़ाई चदकर खैंट पर्वत को पहुंचा जाता है.

खैंट पर्वत पर परियों की किवंद्तियाँ

खैंट पर्वत पर आकर अगर आपको परियां ना मिलें, तो निराश मत होएगा. क्यूंकि फिल्मों की तरह, यहाँ पर परियां, पंख लगाकर हवा में उड़ते हुए नहीं मिलेंगी.

दरअसल; परियों का सम्बन्ध, अध्यात्मिक रूप से है.

आपको बताते चलें कि; उत्तराखंड को देव भूमि कहा जाता है. यहाँ के कण कण में देवी देवता निवास करते हैं.

यहाँ के जंगलों में मौजूद वन देवियों को आन्छरी कहा जाता है. ये वही आन्छरी है, जिन्हें हम परी के नाम से जानते हैं.

क्या वाकई में ! इस स्थान पर आन्छरी मौजूद हैं. दरअसल इसके पीछे एक प्रसिद्ध लोक किवंदिती है. जिसके कारण इस स्थान को परियों का देश माना जाता है.

आइये जानते हैं –

जीतू बगढ़वाल के प्राण हरने वाली किवंदिती

इस सन्दर्भ में सबसे अधिक प्रचलित किवंदिती है – जीतू बगढ़वाल की कहानी.

यहाँ की आन्छरियों (परियों) ने, जीतू बगढ़वाल के प्राण, आषाढ़ (जून) की 6 गते (दिन) को हर लिए थे. जिसकी याद में यहाँ के अनेक गांवो में हर साल इस दिन जीतू बगढ़वाल नृत्य का आयोजन किया जाता है.

मान्यता है कि; जीतू बगढ़वाल, गढ़वाल रियासत की गमरी पट्टी के बगोड़ी गांव का निवासी था. वह तांबे का व्यापारी था. उसका तांबे का व्यापार तिब्बत तक होता था.

उसकी बहन सोबनी, रैथल गांव में ब्याही थी. ऐसा माना जाता है कि; वह अपनी बहन के ननद, भरणा से प्रेम करता था.

जीतू की एक बहुत अच्छी खूबी थी कि; वह बांसुरी बहुत अच्छी बजाता था.

एक बार वह अपने बहन को बुलाने उसके गांव जाता है. रास्ते में थक हारके बैठकर, रैथल के जंगलों में, वह बांसुरी बजाने लग गया.

बांसुरी की मधुर आवाज सुनकर, आन्छरी प्रकट होकर नाचने लगी. और उसके प्राणों को हरने लगी.

जीतू ने विनती की कि; अभी वह अपने बहन को बुलाने उसके गांव जायेगा. फिर अपनी बहन को सुरक्षित अपने गांव ले जाकर, वह स्वयं आन्छरियों के पास आ जाएगा.

आन्छरियाँ मान गयी. और उसे जाने दिया.

परन्तु जीतू ने अपना वायदा नहीं निभाया. अपनी बहन को सुरक्षित गांव छोड़ने के बाद भी जीतू नहीं आया.

ऐसा माना जाता है कि; इसके बाद, आन्छरी स्वयं उसके गांव पहुंची.

उस समय जीतू अपने पूरे परिवार के साथ खेतों में हल लगा रहा था. और दिन था – आषाढ़ की 6 गते .

आन्छरियों ने जीतू को उसके पूरे परिवार के साथ, खेतों से ही हर लिया. वो सभी खेतों में समां गए.

इस घटना की याद में आज भी कई गांवों में जीतू बगढ़वाल के नृत्य का आयोजन किया जाता है.

जीतू बगढ़वाल नृत्य के दौरान गाये जाने वाले गीत के चंद बोल

नौ बैणी आन्छरी ऐन, बार बैणी भराड़ी

क्वी बैणी बैठीन्न, कंदुडयो स्वर

क्वी बैणी बैठीन्न, आंख्युं का ध्वर

छावो पिने खून, आलो खाये मांस पिंड

स्यूं बल्दुं जोड़ी, जीतू डूबी ग्ये

रोपणी का सेरा, जीतू ख्वे ग्ये…

मेले का आयोजन

खैंट पर्वत पर हर साल जून में मेले का आयोजन किया जाता है. कई बार यहाँ पर श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जाता है. आमतौर पर यह मेला सप्ताह भर तक चलता है.

खैंट पर्वत पर Tourism की अपार संभावनाएं

यह स्थान प्रकृति प्रेमियों के लिए स्वर्ग से कम नहीं है. हालाँकि सरकारी प्रयासों की नीरसता के कारण, इस स्थान को पर्यटन में उतना अधिक महत्व नहीं मिलता है.

जबकि यहाँ पर पर्यटन की दृष्टि से काफी अधिक संभावनाएं हैं.

  • पैरा ग्लाइडिंग
  • ट्रैकिंग
  • रॉक क्लाइम्बिंग
  • नाईट कैम्पिंग

पर्यटन की संभावनाओं के लिए पंहुचा शोध दल

शहीद श्रीमती हंसा धनाई राजकीय महाविद्यालय अगरोड़ा, टिहरी गढ़वाल से, 7 सदस्यों का दल, खैंट पर्वत के समीप पीढ़ी पर्वत पर पहुंचा.

"खैंट पर्वत पर अनुसन्धान की संभावनाए"

दल में शामिल; डॉ. प्रमोद सिंह रावत (सहायक प्राध्यापक – भूगोल) ने बताया कि; इस क्षेत्र में पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं.

डॉ. रावत जी ने बताया है कि; इस क्षेत्र में पौधों की विभिन्न प्रजातियां पायी जाती है.

अभी हाल ही में, विख्यात भू-वैज्ञानिक प्रोफेसर बहादुर सिंह कोटलिया जी ने, इस क्षेत्र से 50 करोड़ साल पुराना स्ट्रोमैटोलाईट फॉसिल की खोज की.

निष्कर्ष

तो देखा आपने; खैंट पर्वत पर परियों के अस्तित्व की वास्तविकता. दरअसल; यह सब विश्वास और अध्यात्म का मेल है.

अगर आप इसमें विश्वास करते हैं; तो आपके लिए, इन सभी का महत्व है. और अगर आप विश्वास नहीं करते हैं, तो कोई बात नहीं. प्रकृति के नज़ारे इतने खूबसूरत हैं; कि, इन्सान यहाँ आकर, सब कुछ भूल जाता है.

आशा है; आपको इस आर्टिकल से जरुर कोई नवीन जानकारी मिली होगी. अगर आपको यह आर्टिकल अच्छा लगे, तो Please नीचे comment करके बताये. और इसे अपने दोस्तों के साथ share जरुर करें. ताकि उन्हें भी यह नवीन जानकारी मिल सके.

F&Q

खैंट पर्वत कहाँ स्थित है?

उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल जिले में खैंट पर्वत स्थित है. यह टिहरी गढ़वाल के फेगुलि पट्टी में स्थित है. 10 हजार फीट की उंचाई पर स्थित खैंट पर्वत के दक्षिण में टिहरी झील है. इसका आकार गुम्बद नुमा है.

खैंट पर्वत से सम्बंधित गढ़वाल की कौन सी लोक कथा प्रचलित है?

जीतू बगढ़वाल की कथा

जीतू बगढ़वाल का गांव कहाँ था?

वह गढ़वाल रियासत की गमरी पट्टी के बगोड़ी गांव का निवासी था. वह तांबे का व्यापारी था. उसका तांबे का व्यापार तिब्बत तक होता था.

जीतू बगढ़वाल की बहन का ससुराल कहाँ था?

रैथल गांव में.

गढ़वाल की प्रसिद्ध प्रेम कथाएं किसके बीच हुई?

इस में राजुली-मालूशाही, जीतू बगढ़वाल-भरणा, भाना-गंगनाथ, अमरदेव सजवाण-तिलोगा तदियाल, गजू-मलारी शामिल हैं.

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उत्तराखंड का खैंट पर्वत: जहाँ रहती हैं परियां.  क्या वाकई में ?
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इस आर्टिकल में विस्तार से जानेंगे, खैंट पर्वत के बारे में. आखिर क्यों इसे परियों का देश कहा जाता है? कौन हैं वो 9 बहनें, जो यहाँ रहती हैं? और क्या है इसके पीछे की कहानी ?
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This Post Has 15 Comments

  1. Dr. Sharad Visht

    Great, Dr Ashutosh, you didn’t told me before but once I left county, you shared the information 😀👍, hope one day we will go there.

    1. sure Bisht Ji. This was the trick to catch up with you. We will definitely go there.

  2. राकेश जिर्वाण 'हंस'

    बहुत महत्वपूर्ण जानकारी सर जी। भौगोलिक और सांस्कृतिक दोनों दृष्टियों से ये एक महत्वपूर्ण लेख है । प्रणाम

  3. Someone

    Bahut hi khubsurat..😊👌👌

  4. Ajay Singh

    Good job, keep going.

  5. Anonymous

    Good job, keep going.

  6. Anonymous

    Dr

    Nice sir ji

  7. D. S. Jangwan

    Very nice ati Sundar

  8. आशुतोष मिश्र

    डॉ जंगवाण एक बहुत ही सराहनीय प्रयास आर्थिक दृष्टि से, एक कोशिश क्षेत्रीय विशिष्टता को वैश्विक फलक पर लाने की, एक भौगोलिक शोध को रेखांकित करने का अनुपम प्रयास और शोध की भावी संभावनाओं को सहज भाव से उद्घाटित करने का नेक प्रयास, बाकी परियों का भौतिक अस्तित्व हो या न हो ये अवधारणा ही मानवता के मार्मिक स्थल को स्पर्श करती है………… बस कोविड की स्थिति सामान्य हो तो मैं भी परियों के देश जाना चाहुंगा।
    ऐसे नेक प्रयास के लिए कोटिशः धन्यवाद

  9. Dr. krishna

    बेहतरीन जानकारी ,और पर्यटन की अपार संभावनाओं की ओर ध्यान आकर्षित करने वाला लेख।

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